धर्म की परिभाषा ,अर्थ और महत्व क्या है

धर्म का अर्थ और महत्व

धर्म शब्द का उद्भव धृ धातु से हुआ है जिसका अर्थ है धारण करना |  इस परम सत्ता से जुड़ी रीति, रिवाज, परम्परा, पूजा-पद्धति और दर्शन का समूह धर्म के अंतर्गत आता है | धर्म का एक मुख्य अंग है नैतिक और मानवता |


भारतीय ऋषियों ने इसी सन्दर्भ में धर्म को परिभाषित  किया है |मन को चंचल बताया गया है | यदि हम चंचल मन को काबू में करके प्रभु की सबसे बड़ी सत्ता में अपना पूर्ण ध्यान लगाये वही धर्म है | इसका अंतिम परिणाम होता है मोक्ष की प्राप्ति | अत: ब्रह्म को प्राप्त करना ही धर्म है |

dharm ka arth or mahtav


पढ़े : हिन्दू धर्म के मुख्य धार्मिक प्रतीक

इस मार्ग में चलने वाले को दिव्य द्रष्टि प्राप्त होती है और वो चमत्कारी शक्तियों का स्वामी बन जाता है |

धर्म के पथ पर चले तो आपके साथ कुछ गुण जरुर होने चाहिए वे है अहिंसा , सत्य , दान , उपकार , दया , क्षमा , और किये हुए का उपकार मानना |

यही वे गुण है जो सच्ची मानवता के प्रतीक स्तम्भ है |

मनु ने मानव धर्म के दस लक्षण बताये हैं

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥

(धृति (धैर्य धारण ), क्षमा (दूसरों के द्वारा किये गये अपराध को  क्षमा करना ) , दम ( वासनाओं पर नियन्त्रण ), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (आंतरिक और बाहरी स्वच्छता ), इन्द्रिय निग्रहः (इन्द्रियों को काबू में रखना ), धी (बुद्धि और ज्ञान का  प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा), सत्य (मन वचन कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना)  ये दस मानव धर्म के लक्षण हैं |

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