कुण्डलिनी जागरण के 6 चक्र कौनसे है

हमारे शरीर में 72,000 नाड़ियाँ है जो मूल स्थान से शरीर के विभिन्न भागो में जाती है | जिस स्थान पर बहुत सारी नाड़ियाँ एकत्रित हो जाती है वहा एक चक्र बन जाता है | शरीर में ऐसे 6 मुख चक्र स्तिथ  है | कही कही इनकी संख्या 7 बताई गयी है | इन चक्रों का आकर कमल या पदम् के रूप में होता है | इन सभी चक्रों को एक साथ षटकमल भी कहते है | इनके नाम निम्न है |

कुण्डलिनी जागरण के चक्र

शरीर के षटकमल चक्रों के नाम

मूलाधार , स्वाधिष्ठान  मणिपुर , अनाहत , विशुद्ध , आज्ञा |

जब इन चक्रों का ध्यान किया जाता है तो यह चक्र सिद्ध हो जाते है और अपनी चमत्कारी शक्तियों साधक को प्रदान करते है | कुण्डलिनी जागरण के बाद वो व्यक्ति सामान्य व्यक्ति ना रहकर अत्यंत शक्तिशाली बन जाता है | इन चक्रों को नाड़ीपुंज भी पुकारा जाता है |

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नाड़ियो का विवेचन

शरीर में हजारो नाड़ियो में से 3 मुख्य नाडी है इडा , पिंगला और सुषुम्णा | नाड़ीकंद (नाड़ी उद्गम स्थल ) से ये शरीर के विभिन्न भागो तक जाती है | इस नाड़ीकंद से ही 72,000 नाड़ियाँ निकलती है |

कुण्डलिनी चक्र की शरीर में स्तिथि

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1 . मूलाधार चक्र :- यह चक्र सभी चक्रों के निचे के स्तर पर होता है | रीढ़ की हड्डी के ठीक निचे यह स्तिथ है गुप्तांग और गुदा के बीच अवस्थित होता है | यह लाल रंग का और चार पंखुडि़यों वाला होता है | इसी चक्र में कुण्डलनी शक्ति साढ़े तीन फेरे मार कर सोई हुई रहती है जिससे अभ्यास और ध्यान द्वारा जाग्रत कर दुसरे चक्रों तक भेजा जाता है | इसका बीज मंत्र “लं ” है |

2.स्वाधिष्ठान :- यह चक्र नाभि से 2 अंगुल निचे होता है जो यौन अंत:स्राव उत्पन्न करता है | यह छह पंखुडि़यों वाला नारंगी रंग का कमल है |

3.मणिपुर :- नाभि के मूल में स्तिथ है | यह दस पंखुड़ियों वाला कमल सर्द्रश्य चक्र है जो पाचन की क्रिया को प्रभावित करता है | यह इच्छा , निद्रा मोक्ष ,भय ,शर्म , दुःख आदि का आधार है | इसे जाग्रत करने के लिए “रं” मंत्र का जप करना चाहिए |

4.अनाहत :- यह सीने या ह्रदय में अवस्तिथ है और प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ा है | यह बारह पंखुड़ियों का हरे या गुलाबी रंग का होता है | इसमे ही अहंकार , आशा , संदेह आदि निहित है | इसका ध्यान करने से बुद्धि का विकास और शुद्धि होती है |

5.विशुद्ध :- यह कंठ या गल ग्रंथि में होता है और थायरॉयड हारमोन उत्पन्न करता है  | यह रूप में सोलह पंखुड़ियों वाला कमल है।

6. आज्ञा:- यह तृतीय नेत्र की के स्थान पर ललाट पर होता है जहा तिलक किया जाता है | यह चक्र ही सोने या जागने की क्रिया को नियंत्रित करती है | प्रतिक रूप में यह दो पंखुडि़यों वाला कमल है |

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कैसे करे कुण्डलनी शक्ति जाग्रत

हमारे ऋषियों ने कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत करने के कई उपाय बताये है जिसमे राजयोग , हठयोग , मंत्र योग भक्ति योग , कर्म योग ,सिद्धि योग , लययोग आदि है | कभी कभी दुर्घटनाओ में स्वत: ही कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत हो जाती है | ऐसे बहुत सारे उदाहरण संसार ने देखे है |

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कुण्डलनी शक्ति जाग्रत होने के फायदे

कहते है यह शक्ति जाग्रत होने के बाद व्यक्ति बहुत सारी सिद्धियों की प्राप्ति कर लेता है | वह त्रिकालदर्शी बन जाता है | वो फिर आम व्यक्ति नही रहता | ना ही उसे सांसारिक सुखो का मोह होता है | वो परमतत्व को प्राप्त कर लेता है | उसे किसी बात का भय , शर्म या मानवीय प्रवृति नही रहती | वो जन्म मरण के फंद से निकल कर मोक्ष को प्राप्त कर लेता है |

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