अक्षय पात्र क्या होता है और शास्त्रों में इसका विवरण

अक्षय अर्थात जिसका कभी अंत ना हो , क्षय ना हो | और पात्र का अर्थ आम भाषा में बर्तन से है | महाभारत के वनपर्व में इस अक्षय पात्र के बारे में बताया गया है | यह ऐसा पात्र होता है जिसमे जब भी हाथ डालो आपको खाने और पीने के लिए मनवांछित भोजन और जल की प्राप्ति हो जाएगी |

akshya patra ki mahima

महाभारत में सूर्य उपासना से प्राप्त किया युधिष्ठिर ने अक्षय पात्र

पांडवो को जब 12 साल का अज्ञातवाश झेलना पड़ा तो अपने भाइयो और द्रौपदी की भूख शांत करने के लिए धौम्य ऋषि से युधिष्ठिर ने पेट भरने का उपाय पूछा |

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धौम्य ऋषि ने  युधिष्ठिर को  बताया कि अखंड अन्न प्राप्ति के लिए वे सूर्य भगवान की तपस्या और विधि विधान से पूजा अर्चना करे | पांडवो ने नित्य विधि विधान से गंगा जल से आचमन कर सूर्य नारायण की पूजा अर्चना की और भगवान सूर्य ने उन्हें दर्शन कर उन्हें ताम्बे की बटलोई दी | यह अक्षय पात्र था जो अन्न ,फल , जल आदि देने में समर्थ  था |

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भगवान् सूर्य नारायण की स्तुति में सबसे अहम सूर्य भगवान के 108 नामो का पाठ है | जनश्रुति के अनुसार इसी तरह का अक्षय पात्र आज भी हिमालय के साधुओं के पास है। यह पात्र सूर्य की साधना से ही प्राप्त होता है।

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