पूजा में आचमन का महत्त्व

क्यों पूजा से पहले  आचमन  किया जाता है ?


सनातन धर्म में किसी भी शुभ पूजा या कर्मकांड से पूर्व शरीर को आतंरिक और बाहरी रूप से जल के छींटे देकर शुद्ध करने की क्रिया को आचमन कहा जाता है | आचमन के समय जो थोडा सा जल हम ग्रहण करते है वो ह्रदय के पास आज्ञा चक्र तक ही जाता है और उसे शुद्ध करता है जिससे की हमारे विचार ,चित्त और सोच शुद्ध हो जाते है | आचमन का महत्त्व पूजा में

कैसे किया जाता है आचमन

पूजा से पूर्व व्यक्ति को नहा लेना चाहिए | फिर पूजा स्थल पर आसन पर बैठने से पहले अपने दोनों हाथ और पैर शुद्ध जल से धोकर बैठे | बैठने की विधि या तो सुखासन या सिद्धासन वाली हो |

पूजा में ताम्बे के पवित्र लोटे से मोली बंधी हुई दूर्वा या चम्मच से तीन बार जल हथेली पर लिया जाता है फिर उसे मुंह से ग्रहण करके हाथ धो लिए जाते है | इस विधि से हमारे अन्दर का शुद्धिकरण होता है |


तीन बार जल हमारे आराध्य देव , सभी देवतागण और नवग्रह का ध्यान करके हथेली पर लिया जाता है

इसके बाद जल के छींटे हमारे शरीर पर डालने चाहिए जिसे शरीर का शुद्धिकरण हो |

इसके बाद सिर और दोनों कानो को स्पर्श कर सभी देवी देवताओ को प्रणाम करे और भगवान विष्णु के मंत्र का जाप करे | ॐ केशवाय नम: ॐ लक्ष्मी नाराणाय नम: ॐ माधवाय नम:

आचमन करते समय रखे दिशा का भी ज्ञान

यह शुद्धिकरण करते समय आपका मुंह उत्तर, ईशान या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। इसके अलावा अन्य दिशा की तरफ मुंह होने से आपका आचमन अधुरा ही माना जाता है |

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