नाकोड़ा तीर्थ में विराजित भैरव

नाकोड़ा तीर्थ में विराजित भैरव

गुरुदेव हिमाचल सुरिश्वर जी एक बार सुबह लेटे हुए थे | उन्हें एक बालक पाट के पास फिरता नजर आया | उन्होंने उस बालक को रोककर उसका परिचय पूछा | उस दिव्य तेज वाले बालक ने खुद को भैरव देव बताया और आदेश दिया की उन्हें भी भगवान पार्श्वनाथ जी के मंदिर में बैठाया जाये |



गुरुदेव चिंता में पड़ गये की जिस भैरव के मदिरा बलि सिंदूर चढ़ता है उसे जैन मंदिर में कैसे बैठाये | उन्होंने भैरव जी से विनती की की जैन नियमो के तहत आपको मेवा प्रसाद का हो भोग लगेगा और आपको जनेऊ धारण करनी होगी | भैरव जी मान गये |

भैरव जी गुरुजी से कहा की अब आप मेरा कमर तक धड़ बनाओ | इसके लिए जैसलमेर से पिला पत्थर मंगवाओ | गुरूजी ने भैरव जी की आज्ञा का पालन करते हुए जैसलमेर से पीला पत्थर मंगवाया और सोमपुरा मूर्तिकार से भैरव जी की मूर्ति का निर्माण करवाया | मूर्ति इतनी दिव्य और मनोहर बनी की बस देखते ही रह जाओ |

अब विधि विधान से भैरव जी को नाकोड़ा तीर्थ के पार्श्वनाथ मंदिर में गोखले में विराजित किया गया | साथ ही हनुमानजी की प्रतिमा भी उनके साथ लगाई गयी |




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