प्रदोष व्रत कथा | पूजा विधि और महत्व

प्रदोष व्रत कथा और विधि

Pradosh Vrat Katha , Vidhi , Mahtav In Hindi : हिन्दू धर्म में ईश्वर के प्रति छोटे तप के रूप में व्रत रखा जाता है | भगवान विष्णु के लिए एकादशी तो शिवजी के लिए प्रदोष का व्रत रखने की धार्मिक मान्यता है | यह व्रत ईश्वर के प्रति हमारा समर्पण दर्शाते है | हम सभी जानते है की हर व्रत का कोई अभीष्ट देवी देवता होता है और उस व्रत के अपने नियम विधि  और कथा होती है , जिन्हें व्रत करने वाले को पालन करना चाहिए | आज हम भगवान शिव को समर्प्रित व्रत प्रदोष की व्रत कथा , महत्व और विधि के बारे में जानेंगे |

pradosh vrat ki vidhi

जाने : शिव को क्यों पसंद है प्रदोष का व्रत – प्रदोष महत्व


प्रदोष व्रत कब आता है

प्रदोष व्रत साल में कई बार आता है , कभी कभी तो यह माह में दो बार भी आ जाते है | यह व्रत हिन्दू कैलेंडर के अनुसार मास के दोनों पक्षों की त्रयोदशी को किया जाता है | यह व्रत दिन वार को आता है उसके अनुसार व्रत करने का फल प्राप्त होता है |

प्रदोष संध्या से रात्रि के बीच का समय होता है , इस समय में भगवान शिव की पूजा अत्यंत फलदायी बताई गयी है |

प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा –

स्कंद पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा लेने जाती और संध्या को लौटती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुन्दर बालक अकेला दिखाई दिया |

दरअसल वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था, जिसका राज्य और परिवार एक युद्ध में उससे छीन गया था | युद्ध में उसके माता पिता की भी मृत्यु हो गई थी ।


नदी किनारे उदास बालक को देखकर ब्राह्मणी का ममत्व जाग गया और वह उसे अपने साथ ही ले आई | अब ब्राह्मणी उसका ध्यान और पालन पोषण अपने पुत्र की तरह ही करने लगी | राजकुमार को उसमे अपनी माँ नजर आने लगी | एक दिन एक मंदिर में उन तीनो की भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई।

ऋषि ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भदेश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे।

यह सुन ब्राह्मणी बेहद दुखी हुई | ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ऋषि आज्ञा से दोनों बालकों और ब्राह्मणी ने पूर्ण विधि-विधान से प्रदोष व्रत करना शुरू किया।

एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आईं। उसमे से एक “अंशुमती” नाम की रूपवती कन्या राजकुमार धर्मगुप्त से मोहित हो गयी और उसे अपने पिता से भेंट करवाई |  गंधर्व कन्या के पिता को मालूम हुआ कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है।  उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह उस राजकुमार से करा दिया |

शिव कृपा से राजकुमार के सितारे और ग्रह चमकने लगे | उसने गंधर्व सेना की मदद से फिर से अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त कर लिया |

राजकुमार को यह अहसास हो गया की यह सब शिव की कृपा से हुआ है  और इसके पीछे ब्राह्मणी , उसके पुत्र और उसके द्वारा किये गये प्रदोष व्रत का फल है |

 

तभी से हिदू धर्म  प्रदोष व्रत का बहुत महत्व है जो हर कठिनाई को दूर करने की क्षमता रखता है | जन्मो जन्मो तक मनुष्य दरिद्रता से दूर हो जाता है | जीवन के कष्ट दूर होकर भोले बाबा व्रती पर अपनी कृपा बरसाते है |

कैसे करे प्रदोष व्रत

pradosh pujaत्रयोदशी के दिन सूर्यास्त से पहले संध्या में स्नान कर सफेद वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद सायंकाल में विभिन्न पुष्पों, लाल चंदन, हवन और पंचामृत द्वारा भगवान शिव शंकर की पूजा करनी चाहिए। इस पूजा में सम्पूर्ण शिव परिवार का पूजन करे | यह प्रक्रिया पुरे एक साल तक सभी प्रदोष में निभाए |

बाद में प्रदोष व्रत का उद्यापन भी करना चाहिए |

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