आंवला नवमी की कहानी – आंवले के दान से मिला हर सुख

आंवला नवमी की कहानी – आंवले के दान से मिला हर सुख

Story Behind Amla Navami Festival – Aamla Navami Ki Kahani In Hindi


कार्तिक मास की शुक्ल अष्टमी को आंवला नवमी का पर्व मनाया जाता है | आंवले के पेड़ का धार्मिक और स्वास्थ्य सम्बन्धी महत्व अत्यंत है | शास्त्रों में बताया गया है की सबसे पहले आंवले का पेड़ ही ब्रह्मा जी के आंसू से उत्पन्न हुआ था और इस पेड़ में भगवान नारायण का वास है | आंवला नवमी व्रत इसी पेड़ की महिमा में किया जाता है |

आंवला नवमी व्रत कथा

पढ़े : हिन्दू सनातन धर्म से जुडी पौराणिक कथाये

आइये अब जानते है की आंवला नवमी – अक्षय नवमी की आंवले से सम्बंदित कथा के बारे में …

प्राचीन समय में एक  राजा हुए जिन्होंने यह प्रण लिया था की  वह रोज सवा मन आँवले का दान करेंगे | इसी कारण उनकी प्रज्ञा उन्हें आँवलया के नाम से पुकारती थी | दान करके ही खाना खाता था।

राजकुमार को अपने पिता का यह प्रण अच्छा नही लगता है था और उसे यह भय था की ऐसा रोज करने से एक दिन राज खजाना खाली हो जायेगा |राजकुमार ने अपने पिता को आंवले का दान करने के लिए मना कर दिया |


अपने पुत्र की इस बात से रुष्ट होकर राजा अपनी रानी सहित राज्य छोड़कर जंगल में निकल गये |अब उनके पास कुछ नही बचा था | वे रोज अपना प्रण भी पूरा नही कर पा रहे थे , अत: उन्होंने भोजन और जल का भी त्याग कर दिया |

aanwale ka daan

भूखे प्यासे सात दिन जंगल में ही बीत गये | भगवान को अपने भक्त पर दया आ गयी और उन्होंने अगले दिन रात्रि में ही उस जंगल में महल, राज्य और बाग -बगीचे सब बना दिए और ढेरों आँवले के पेड़ लगा दिए |

सुबह जब राजा उठा तो उसे लगा की जगंल में ही राज्य से भी दुगना राज्य बसा हुआ मिला | उन्होंने प्रभु का धन्यवाद किया और फिर से हर दिन आंवले का दान करने लग गये |

दूसरी तरफ जिस पुत्र ने लोभ लालच में अपने माता पिता को राज्य से निकाला था , उसे बुरे परिणाम भुगतने पड़े | उसका राज्य शत्रु सेना ने जीत लिया | अपने प्राणों की रक्षा कर वह अपनी पत्नी के साथ  नजदीकी राज्य में पहुंचा जहा उनके पिता ही राजा थे |

aanwala ped

ना राजा ने उन्हें पहचाना ना ही पुत्र ने अपने पिता को पहचाना | क्योकि भाग्य ने दोनों की किस्मत पलट दी थी |

एक दिन पुत्र की पत्नी महारानी के बाल गूँथ रही थी | तभी उसे महारानी की पीठ पर एक मस्सा दिखाई दिया | इसे देखकर उसे अपनी सासू माँ की याद आ गयी और उसके नयनो से आंसू निकलने लगे | यह आंसू महारानी की पीठ पर टप टप गिरने लगे |

महारानी ने पूछा कि तुम क्यों रो रही हो | तब उसने अपने सास ससुर के राज्य छोड़ने की पूरी कहानी बताई |

महारानी ने अब अपने बहु बेटे को पहचान लिया और उन्हें माफ़ कर दिया | माँ ने बताया की बेटा दान करने से पैसा कम नही होता बल्कि दुगुना बढ़ता है | अब वे सब उस राज्य में रहने लगे और पिता के साथ हर दिन बेटा भी आंवले का दान करने लगा |

हे भगवान ! जैसा राजा रानी का सत रखा वैसा सबका सत रखना। कहते सुनते सारे परिवार का सुख रखना।

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