विष्णु भगवान के घोड़े का सिर

एक समय भगवान विष्णु वैकुण्ठ धाम में एक धनुष की  डोरी के सहारे सो गये | उन्हें अच्छे से नींद आ गयी | दूसरी तरफ स्वर्ग लोक में दानवो ने अपना आतंक फैला रखा था | स्वर्ग के देवता ब्रह्मा जी के पास अपनी परेशानियों के समाधान के लिए गये |



ब्रह्मा जी ने उन्हें भगवान विष्णु की शरण में जाने की बात कही | जब देवता वैकुण्ठ धाम पहुंचे तो गहरी नींद में भगवान विष्णु को पाया | किसी देवता में इतनी हिम्मत नही थी की वे भगवान विष्णु की नींद को उडाए | वे फिर से ब्रह्मा जी के पास गये और विष्णु भगवान की निद्रा भंग करने की युक्ति पूछने लगे |

तब ब्रह्मा जी ने वम्री नामक एक कृमि (कीड़ा) उत्पन्न किया और विष्णुजी को उठाने के लिए उसे छोड़ दिया | उस कृमि ने जाकर धनुष की डोर को काट दिया जिसके सहारे  विष्णुजी सो रहे थे | ऐसा करते धनुष की डोर से भगवान विष्णु का शीश कट गया | समस्त  ब्रह्माण्ड



अंधकार में खो गया | सभी देवता भयभीत हो गये | तब ब्रह्मा जी ने उन्हें देवी भगवती से विनती करने को कहा |

देवी भगवती प्रकट हुई और उन्होंने बताया की यह सब एक दैत्य का वध करने के लिए घटित हुआ है | आप सभी किसी अश्व का सिर लाये और भगवान विष्णु के धड़ पर लगाये | उन्होंने बताया की एक अश्व मुखी दैत्य ने उनकी घोर तपस्या करके उनसे यह वरदान मांग लिया था की उसका वध उसकी तरह का ही कोई अश्व सिर वाला ही करे | अत: अब समय आ गया है की भगवान विष्णु का अश्व का सिर धारण करके उस दैत्य का संहार करे |

माँ भगवती के आदेशानुसार विष्णु जी को अश्व का सिर लगाया  गया और उन्होंने उस दैत्य   हयग्रीव का वध कर दिया |

इस प्रकार भगवान विष्णु जी की कृपा से देवताओ को पुनः स्वर्ग की प्राप्ति हुई |

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