कृष्ण ने हराया हनुमानजी को अर्जुन से

कृष्ण ने अर्जुन को हनुमान से जीता दिया

इस कथा में बहुत सारे सवालो के जवाब छिपे हुए है जैसे की ….

क्यों अर्जुन के रथ पर हनुमानजी सवार थे | क्यों अर्जुन युद्ध से पहले आत्महत्या करना चाहते थे | और क्यों हनुमानजी को कृष्ण ने अर्जुन के हाथो हरवाया |

आपने देखा होगा की अर्जुन के रथ पर श्री हनुमान जी ध्वजा के ऊपर विराजित होकर अर्जुन के रथ को सुरक्षा दे रहे थे | पर ऐसा हुआ था एक शर्त के कारण | उस शर्त में भगवान श्री कृष्ण ने वेश बदलकर हनुमानजी को अर्जुन से हरवाया था |

श्री हनुमद् पुराण में एक प्रसंग इस बात पर रोशनी डालता है |

एक बार अर्जुन रामेश्वर के धनुषकोटि तीर्थ पर स्नान कर रहे थे | उन्हें एक पर्वत पर एक वानर को देखा जो हनुमानजी थे | उन्हें देखा अर्जुन ने जान लिया की यह राम भक्त हनुमान है | अर्जुन को अपनी शक्ति पर घमंड था | उन्होंने व्यंग रूप में हनुमान से कहा की तुम लोगो ने समुन्द्र के उस पार जाने के लिए जो पत्थरो से सेतु बांधा , वो मूर्खतापूर्ण कार्य था | मेरा जैसा यदि विद्वान और अच्छा धनुर्धर होता तो अपने दिव्य बाणों से क्षण भर में ही सेतु बना देता |

हनुमानजी ने अर्जुन की घंमड भरी बातो पर हंसी आ गयी | उन्होंने बताया की ये बाणों से बना सेतु वानरो का भार वहन नही कर सकता था | अर्जुन को अपनी शक्ति पर ज्यादा ही गर्व था | उन्होंने हनुमानजी को ललकारा की मैं अभी बाणों से सेतु बनाता हूँ , और वो सेतु आपके वजन से टूटेगा नही | हनुमानजी कैसे चुप रहने वाले थे उन्होंने भी कह दिया की तुम्हारा सेतु मेरे अंगूठे तक का भर सह नही पायेगा |

ऐसा सुनकर अर्जुन ने कहा की यदि ऐसा होगा तो वे अपनी हार के बाद अग्नि में खुद के अपनी जान दे देंगे | हनुमानजी ने अर्जुन को वचन दिया की यदि वे हार गये तो अर्जुन के रथ की ध्वजा पर सवार होकर उसकी सुरक्षा करेंगे |

इसके बाद अर्जुन ने अपना धनुष उठाया और क्षण भर में बाणों से सेतु बना दिया और हनुमानजी को कहा की आपका वजन यह सेतु आसानी से सह लेगा | हनुमानजी ने जैसे ही उस सेतु पर अपना अंगूठा रखा सेतु गिर पड़ा |

अर्जुन का घमंड पूरी तरह चूर हो गया | शर्त के अनुसार अर्जुन को  अग्नि दाह करना था | हनुमानजी ने उन्हें माफ़ कर दिया पर अर्जुन नही मान रहे थे |  भगवान श्री कृष्ण ने वेश बदलकर उन दोनों के करीब पहुँच गये |

उन्होंने हनुमानजी से पुनः इसी शर्त को दोहराने की बात कही | हनुमानजी मान गये और अर्जुन ने फिर से अपने दिव्य बाणों से सेतु बना दिया | इस बार हनुमानजी के लाख प्रयत्न के बाद भी सेतु तस से मस नही हुआ |

हनुमानजी विस्मित हो गये उन्होंने घोर से देखा तो भगवान श्री कृष्ण का सुदर्क्षण चक्र उस सेतु को सहारा दिए हुए था | वे समझ गये की नारायण की कृपा से यह सब हुआ है |

शर्त हारने के कारण हनुमानजी को अर्जुन के रथ की ध्वजा पर सवार होकर उन्हें सुरक्षा देनी पड़ी |

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