सोमनाथ ज्योतिर्लिंग

somnath jyotirling

शिव महापुराण के अनुसार सोमनाथ ज्योतिर्लिंग, भगवान शिव का प्रथम ज्योतिर्लिंग है । यह बहूत ही भव्यशाली और पौराणिक इतिहास समेटे हुए है | हिन्दू धर्म के मुख्य धर्म ग्रंथो में इस शिवलिंग की महिमा का गुणगान किया गया है |  यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। ऐसी मान्यता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं चंद्र देवता  ने की थी। उनके नाम पर ही इन्हे सोमनाथ कहा जाता है | सोम का अर्थ चन्द्र और नाथ का अर्थ स्वामी |


यह मंदिर हिंदू धर्म के उत्थान-पतन के इतिहास का प्रतीक रहा है। इस मंदिर को बाहरी ताकतों ने बार बार लुटा है , अत्यंत वैभवशाली होने के कारण इतिहास में कई बार यह मंदिर तोड़ा तथा पुनर्निर्मित किया गया। वर्तमान भवन के पुनर्निर्माण का आरंभ भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने करवाया |
पुराणो में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना से सम्बंधित कथा इस प्रकार है-

एक बार जब प्रजापति दक्ष ने अपनी 27 कन्याओ का विवाह चंद्रमा से कर दिया | और वे बड़े प्रसन्न थे अपने दामाद के रूप में सोम को देखकर | उन्हें पूर्ण संतुष्टि थी की उनकी कन्याये अपने पति के साथ सुखी जीवन व्यतीत करेगी | चन्द्रमा को अपनी पत्नियों में सबसे प्रिय रोहिणी थी | रोहिणी के अलावा बाकि दक्ष कन्याओ को अपने पति का प्रेम प्राप्त नही हो रहा था | सभी अत्यंत दुखी थी और यह बात उन्होंने अपने पिता से बताई और इसके समाधान के लिए उनसे आग्रह किया |

राजा दक्ष ने अपनी सभी पुत्रियों के सुखो के लिए चंद्रमा से भेट की और उन्हें प्रेमपूर्वक कहा की वे किसी भी पत्नी के साथ भेदपूर्ण व्यवहार ना करे | उन्हें लगा की उनकी बातो को चन्द्रमा अपनाएंगे और उनकी पुत्रिया सुखी रहेगी | यह सोचकर दक्ष वहा से प्रस्थान कर गये |

इतना समझाने के बाद भी चन्द्रमा का अपनी पत्नियों के साथ वही व्यवहार रहा | हर बार की तरह अब भी वे अन्य पत्नियों की अवहेलना करते थे | जब पुनः यही व्यवहार की खबर दक्ष को पड़ी तो फिर से उन्होंने चंद्रमा से भेट कर फिर उन्हें समझाया | पर बार बार समझाने के बाद भी चंद्रमा के व्यवहार में कोई सुधार नही आया |

दुखी दक्ष ने अंत में उन्हें श्राप दे दिया तुमने बार बार मेरे विन्रम आग्रह को टुकरा दिया है अत: अबसे तुम्हे क्षयरोग से पीड़ित होना पड़ेगा |

इस श्राप के प्रभाव से चन्द्रमा क्षय रोग से ग्रसित हो गये और फिर समस्त जगत में हाहाकार मच गया | देवता ऋषि सभी परेशान हो गये | और फिर इंद्र सहित सभी ब्रह्माजी की शरण में इसके निवारण के लिए पहुँचे | सारा वर्तांत सुनकर ब्रह्माजी ने युक्ति बताई की यदि शिवलिंग की पूजा की जाये और शिवजी के प्रसन्न होने पर ही यह श्राप समाप्त किया जा सकता है | उन्हें मृत्युंजय-मंत्र का अनुष्ठान करते हुए श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की आराधना करके उन्हें प्रसन्न करना पड़ेगा |


यह सुनकर चंद्रदेव ने बताये अनुसार शिवलिंग स्थापित कर घोर तपस्या और शिव आराधना की | उनकी निष्ठा और कठोर तप से और दस करोड़ मृत्यंजय-मंत्र के जप से शिवजी प्रसन्न हुए |

चंद्रदेव को दर्शन देकर उन्हें मनोकामना पूर्ति का वरदान दिया |

वरदान के प्रभाव से चन्द्र का का आज भी कला एक पक्ष में निरंतर क्षीण हुआ करती और अगले पक्ष में प्रतिदिन निरंतर बढ़ती है | चन्द्रमा शिवजी के आशीष से बड़े प्रसन्न हुए |

 

लोक कल्याणार्थ शिवजी सोमनाथ शिवलिंग के रूप में आज भी अपने भक्तो को दर्शन देते है |

 

कैसे पहुँचें?
रेल मार्ग- सोमनाथ से सिर्फ 7 किमी की दुरी पर वेरावल रेलवे स्टेशन है जो बड़े बड़े शहरो से जुड़ा हुआ है |
वायु मार्ग- नजदीकी हवाई अड्डा ५५ किमी की दुरी पर केशोड है | यहा से आप टैक्सी किराये पर लेकर सोमनाथ तक पहुँच सकते है |

सड़क परिवहन-

मुख्य शहरो से सोमनाथ की दुरी :

वेरावल से 7 किमी

मुंबई 889 किमी

, अहमदाबाद 400 किमी

भावनगर 266 किलोमीटर

जूनागढ़ 85 किमी

पोरबंदर 122 किमी

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