जगन्नाथपूरी रथयात्रा से जुडी रोचक बाते

भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमाओं को तीन अलग-अलग दिव्य रथों में नगर भ्रमण करवाया जाता है | यह रथ यात्रा दो किमी की दुरी पर गुंडिचा मंदिर पर समाप्त होती है | लाखो भक्त इस धार्मिक रथ यात्रा का हिस्सा बन कर पूण्य के भागी बनते है |

जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा

गुंडिचा मंदिर में करते है 7 दिन आराम :

जगन्नाथ भगवान अपने भाई और बहिन के साथ गुंडिचा मंदिर में सात दिन विश्राम करते है | मान्यता है की यह उनकी मौसी का घर है और यही पर विश्वकर्मा ने इन तीनो मूर्तियों का निर्माण किया था |

जगन्नाथपूरी रथयात्रा में ये है रोचक बाते

  1. रथ का रंग : तीन रथो में सबसे बड़ा रथ भगवान जगन्नाथ का होता है जिसक रंग लाल या पीले रंग का होता है |
  2. रथ को रखते है हल्का : इन तीनो रथो का हल्के वजन का बनाया जाता है , इसी कारण नीम या नारियल के पेड़ की लकड़ी निर्माण में काम में ली जाती है |
  3. घरो में पूजा नही : रथयात्रा के दिनों में लोग घरो में पूजा नही करते , ना ही उपवास रखते है |
  4. रथ में नही होती कील : तीनो रथो के निर्माण में कोई भी कील या बोल्ट काम में भी लिया जाता है |
  5. रथयात्रा शुरू होने का दिन : रथयात्रा आषाढ़ माह की शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि से शुरू की जाती है | धूम धाम से गाजे बाजे के साथ तीनो प्रभु रथ में सवार होकर सवारी करते है | सोने की झाड़ू से मार्ग को साफ़ किया जाता है |
  6. रथो के नाम : बलरामजी के रथ को   ” तालध्वज ” , जिसका रंग लाल और हरा होता है। देवी सुभद्रा के रथ को ” दर्पदलन ” , जो काले नीले और लाल रंग का होता है, जबकि भगवान जगन्नाथ के रथ को ” नंदीघोष ” या ” गरुड़ध्वज ”  कहते हैं। इसका रंग लाल और पीला होता है।
  7. रथो पर रक्षा के प्रतीक : जगन्नाथ भगवान के रथ पर हनुमान और नरसिंह भगवान के प्रतीक होते है | सुदर्शन चक्र भी प्रतीक रूप में होता है | बलरामजी के रथ पर शिवजी प्रतीक रूप में होते है | सुभद्रा जी के रथ की रक्षक माँ दुर्गा व सारथी अर्जुन होते है |
  8. रथयात्रा का पुनः मंदिर में आना : रथ यात्रा पुनः दशमी को जगन्नाथपुरी मंदिर में आ जाती है , पर तीनो देवताओ को अगले दिन एकादशी के दिन ही स्नान कराके मंदिर में लाया जाता है |

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