माँ लक्ष्मी ने शुरू की रक्षा बंधन की परम्परा – पौराणिक कहानी

रक्षा बंधन पर्व पर लक्ष्मी और बलि के पौराणिक कथा


Rakhi Festival Story From Puran : पुराणों में कथा के अनुसार एक बार महाबली और महादानी  दैत्य राजा बलि ने गुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से महातप रूपी 110 यज्ञ शुरू किये | देवी देवताओ को भय सताने लगा की यदि यह यज्ञ सम्पन्न हो गये तो बलि त्रिलोक विजेता बन जायेगा |

राखी बांधने की प्रथा


देवताओ की करुण पुकार पर भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण करके बलि से तीन पग जमीन में सब कुछ अपने नाम कर लिया | विष्णु बलि के महादान से प्रसन्न हुए और उन्हें अपने दर्शन दिए | उन्होंने बलि से वरदान मांगने को भी कहा |

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बलि ने पाताल लोक में विष्णु जी के साथ रहने की इच्छा जाहिर कर दी | भगवान विष्णु ने उनकी यह बात मान ली |

इस वचन से सबसे ज्यादा दुखी लक्ष्मी जी हुई | नारद मुनि ने उन्हें बलि को भाई बनाने और राखी भेजने का उपाय बताया |

लक्ष्मी जी वैसा ही किया और पाताल लोक जाकर बलि के हाथो में राखी बांध दी और उन्हें अपना भाई बना लिया | बलि ने अपने बहिन से उपहार मांगने की बात कही | लक्ष्मी ने विष्णु भगवान को साथ ले जाने की बात कही | राजा बलि ने यह उपहार उन्हें दे दिया | मान्यता है की यह दिन श्रावण मास की पूर्णिमा का था , और तबसे यह रक्षा बंधन की परम्परा बन गयी |

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महाभारत में द्वौपदी का कृष्ण को भाई बनाना

महाभारत काल में एक बार शिशुपाल का वध करते समय सुदर्शन चक्र से भगवान कृष्ण की अँगुली चोटिल हो जाती है |

बहता हुआ रक्त देखकर द्रौपदी अपनी साड़ी को फाड़कर कृष्ण की अंगुली पर पट्टी कर देती है | भगवान कृष्ण द्रौपदी को अपने बहिन मान लेते है और उनकी रक्षा करने का वचन दे देते है | चीरहरण के समय कृष्ण अपनी बहिन की लाज रखते है और उसकी साडी को बढ़ाते ही जाते है | इस तरह यह परम्परा शुरू हो गयी की बहिन की रक्षा भाई जरुर करेगा |
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