मणिकर्णिका घाट का सबसे पवित्र स्नान

Manikarnika Ghat Kaashi Main Bath Festival Day

भगवान शिव की नगरी काशी में गंगा तट पर 84 घाट बने हुए है पर इन सभी घाटो में सबसे अलग है मणिकर्णिका घाट | यह घाट श्मशान के निकट है | इस घाट को लेकर ऐसी मान्यता है कि इस श्मशान की अग्नि कभी शांत नही होती | और इस घाट पर जिस व्यक्ति की चिता जलती है वो मोक्ष को प्राप्त करता है | इसलिए हिन्दू धर्म में मौत के करीब वाले सभी यही चाहते है कि उनका अंतिम समय काशी नगरी में बीते और उनका दाह संस्कार इसी मणिकर्णिका घाट पर हो |

मणिकर्णिका घाट का स्नान

इस साल मणिकर्णिका घाट का पवित्र स्नान 2019 में 10 नवम्बर को है |

शिव को हिन्दू धर्म में संहारक माना जाता है | शव का राख होकर शिव में समागम होता है | जीवन के साथ मरण ही इस संसार की सही क्रियाविधि का निर्वाह करता है | इन्ही बातो के कारण शिव को भस्म प्रिय है और शिव अभिषेक में भस्म का प्रयोग भी किया जाता है |

vishnu aur shiv parvati

मणिकर्णिका घाट पर सबसे अच्छा दिन  स्नान के लिए कौनसा है ?

अनन्त शांति अर्थात मोक्ष प्रदान करने वाला यह घाट मणिकर्णिका साल में एक दिन पवित्र स्नान के लिए जाना जाता है | यह दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चौदस तिथि यानी की बैकुण्ठ चतुर्दशी का है | कहते है भगवान विष्णु ने इसी स्थान पर कई साल शिव और पार्वती की तपस्या की थी | उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उनसे वरदान मांगने को कहा | तब भगवान विष्णु ने उनसे दो वरदान मांगे थे |

  1. इस जगत के अंत तक काशी नगरी सुरक्षित रहे | तब शिवजी ने उन्हें यह वरदान दे दिया था और कहा था कि जब सम्पूर्ण जगत नष्ट होगा तब वे अपने त्रिशूल की नोक पर काशी नगरी को उठा लेंगे |
  2. दुसरे वरदान में विष्णु ने माँगा था कि जो बैकुण्ठ चतुर्दशी के दिन इस मणिकर्णिका घाट पर स्नान करे , उसे आप मोक्ष दे |

इसी कारण हर साल कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी पर मणिकर्णिका घाट पर देश भर से श्रद्दालु पवित्र स्नान करने आते है | इस घाट पर जलती चिताओ के बीच रात्रि के तीसरे पहर  स्नान करके उनके मन में एक भी भाव आता है कि हे प्रभु , हमारी मृत्यु के बाद जीवन मरण के चक्र से हमें मुक्त करे और मोक्ष प्रदान करे | हमें 84 लाख योनियों में गमन ना करना पड़े |

क्यों यह घाट कहलता है मणिकर्णिका ?

अब चलिए जानते है कि क्यों इस घाट का नाम मणिकर्णिका पड़ा | इसके लिए पार्वती जी  के स्नान से जुडी हुई एक कथा है | कहते है की इस मणिकर्णिका कुण्ड को भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से बनाया था | यहा उन्होंने शिव पार्वती की घर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया था | इसी कारण शिव और पार्वती जी को यह स्नान बहुत प्रिय लगने लगा | एक बार इसी घाट पर माँ पार्वती नहा रही थी और उनके कानो की बाली इस स्थान पर गिर गयी | इसी कारण इसका नाम मणिकर्णिका पड़ गया | संस्कृत में कर्णिका का अर्थ कान से और मणि का अर्थ आभूषण से है |

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