मुस्लिम भक्त कृष्ण के रसखान की कहानी जीवनी

कृष्ण के भक्त मुस्लिम कवि रसखान

आइये आज जानते है रस के खान – रसखान के जीवन आज हम आपको एक ऐसे ही संत की कहानी बताने जा रहे है जो मुसलमान होते हुए भी कृष्ण के भक्ति में ऐसे डूबे की ना हिन्दू रहे और ना ही मुस्लिम , वे बन गये धर्म मजहब से ऊपर नेक इंसान |


जन्म और वास्तविक नाम

रसखान का जन्म 16वीं सदी में हुआ था. जन्म के समय उनका नाम सैय्यद इब्राहीम था. बचपन में ही वो कृष्ण भक्त बन गए थे.गोस्वामी विठ्ठलनाथ से दीक्षा ग्रहण करने के बाद रसखान कृष्ण की नगरी ब्रज (मथुरा ) में आये और उनके प्रेम में हमेशा के लिए यही बस गये . उन्होंने कृष्ण प्रेम में कई प्रसिद्ध दोहे और कविताये लिखे | उनमे से एक है “मानुष हों तो वही रसखान, बसौं नित गोकुल गाँव के ग्वारन।” |रसखान कृष्ण प्रेम


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रसखान का कृष्ण प्रेम

रसखान के अनुसार यह जन्म कृष्ण भक्ति में बिताना ही सच्चा जीवन है | कृष्ण का ब्रज से बड़ा कोई तीर्थ नही है | धन्य है वे पशु और पत्थर जिन्हें इस धरती पर जन्म लेने का सौभाग्य मिला | उन्होंने इसी धरा पर अंतिम सांस लेकर समाधी ले ली | गोकुल, वृन्दावन और मथुरा में आज भी रसखान का नाम भगवन कृष्ण के सबसे बड़े भक्तों में लिया जाता है |

रसखान की प्रसिद्ध रचना

मानुष हों तो वही रसखान, बसौं नित गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तौ कहा बसु मेरौ, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन।।
पाहन हौं तौ वही गिरि कौ जुधर्यौ कर छत्र पुरंदर कारन।
जो खग हौं तो बसेरौं नित, कालिंदी-कूल कदंब की डारन।।

रसखान के दोहे

रेम प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोइ।
जो जन जानै प्रेम तो, मरै जगत क्यों रोइ॥

कमल तंतु सो छीन अरु, कठिन खड़ग की धार।
अति सूधो टढ़ौ बहुरि, प्रेमपंथ अनिवार॥

काम क्रोध मद मोह भय, लोभ द्रोह मात्सर्य।
इन सबहीं ते प्रेम है, परे कहत मुनिवर्य॥

बिन गुन जोबन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि।
सुद्ध कामना ते रहित, प्रेम सकल रसखानि॥

अति सूक्ष्म कोमल अतिहि, अति पतरौ अति दूर।
प्रेम कठिन सब ते सदा, नित इकरस भरपूर॥

प्रेम अगम अनुपम अमित, सागर सरिस बखान।
जो आवत एहि ढिग बहुरि, जात नाहिं रसखान॥

भले वृथा करि पचि मरौ, ज्ञान गरूर बढ़ाय।
बिना प्रेम फीको सबै, कोटिन कियो उपाय॥

दंपति सुख अरु विषय रस, पूजा निष्ठा ध्यान।
इन हे परे बखानिये, सुद्ध प्रेम रसखान॥

प्रेम रूप दर्पण अहे, रचै अजूबो खेल।
या में अपनो रूप कछु, लखि परिहै अनमेल॥

हरि के सब आधीन पै, हरी प्रेम आधीन।
याही ते हरि आपु ही, याहि बड़प्पन दीन॥

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