महान गुरु वशिष्ट की महिमा और रोचक बाते

वेदों और पुराणों में सौम्य स्वभाव के दिव्य शक्तियों से पूर्ण महान गुरु वशिष्ट के बारे में बताया गया है | भारत के युगों के इतिहास में इनका नाम अमर और सुनहरे गुरु के रूप में जाना जाता है | इन्हे मंत्रद्रष्टा भी कहा जाता है क्योकि इन्होने दीर्घकालीन समाधी रूप साधना से वैदिक ऋचाओ का ज्ञान प्राप्त कर लिया था |

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सदाचार और कर्मयोग पथ पर चलकर इन्होने अनगिनत सिद्धियाँ प्राप्त की जो अपने श्री राम जैसे शिष्यों को सिखा दी |

गुरु वशिष्ट सप्तऋषियों में सम्मिलित है और यह अत्यंत दीर्घजीवी थे |

ब्रह्माजी के पुत्र वशिष्ट जी ने भूमंडल में आकर सूर्यवंशीय राजाओं की शिक्षा दी जिसमे दशरथ नंदन श्री राम , लक्ष्मण , भरत और शत्रुधन शामिल है |

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महा मृत्‍युंजय मंत्र के रचियता

मृत्यु निवारक त्रयम्बक मंत्र ” ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !! ” इन्ही गुरु ने रचा था जो मरे हुए व्यक्ति को फिर से जीवित रखने की क्षमता रखता है |

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विश्वामित्र और वशिष्ट विवाद :

पहले विश्वामित्र एक क्षत्रिय राजा थे | वे गुरु वशिष्ट के आश्रम में बंधी कामधेनु गाय को लेना चाहते थे | इसके लिए उन्होंने वशिष्ट आश्रम में अपने पुरे सैन्य बल के साथ हमला किया | वशिष्ट महा तपस्वी थे अत: उन्होंने अपने तपोबल पर विश्वामित्र को हरा दिया | विश्वामित्र ने तब वसिष्ट से भी बड़े ऋषि बनने के लिए महा तपस्या की थी |

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