बटुक भैरव जी का स्त्रोत

भैरव स्त्रोतम

बटुक या काल भैरव स्त्रोत

यह बटुक भैरव स्त्रोत बहुत शक्तिशाली है और जल्द ही अपना प्रभाव दिखाता है | भैरव मंत्र साधना में इसका मन से पाठ करने से पापो का नाश होता है | आइये जानते है इसे |

ॐ यम् यम् यम् यक्षरूपम् दशदिशि वदनं भूमि कम्पाय मानम्
सम् सम् संहारमूर्तिम् शिरमुकुटजटा शेखरम् चन्द्रबिम्बम्
दम् दम् दम् दीर्घकायम् विकृतनखमुखम् उर्ध्वरोमम् करालम्
पम् पम् पम् पाप नाशम्, प्रणमत सततम् भैरवम् क्षेत्रपालम् ||१ ||

ॐ रम् रम् रम् रक्तवर्णम् कटिकटित तनुम् तीक्ष्ण दन्ष्ट्राकरालम्
घम् घम् घम् घोषघोषम् घघ घघ घटितम् घच्चरम् घोरनादम्
कम् कम् कम् कालपाशम् धृक धृक धृकृतम् ज्वालितम् कामदाहम्
तम् तम् तम् दिव्यदेहम्, प्रणमत सततम्, भैरवम् क्षेत्रपालम् ||२ ||

ॐ लम् लम् लम् लम्बदन्तम् लल लल लुलितम् दीर्घजिह्वा करालम्
धूम् धूम् धूम् धूम्रवर्णम् स्फुट विकृतमुखम् भासुरं भीमरूपम्
रुम् रुम् रुम् रूण्डमालम् रुधिरमय मुखं ताम्रनेत्रमम् विशालं
नम् नम् नम् नग्नरूपं , प्रणमत सततम् भैरवम् क्षेत्रपालम् || ३ ||

ॐ वम् वम् वम् वायुवेगम् प्रलय परिमितं बह्र्मरूप स्वरूपं
खम् खम् खम् खड्गहस्तम् त्रिभुवन निलयम् भास्करम् भीमरूपम्
चम् चम् चम् चालयंतं चल चल चलितं चालितम् भूतचक्रम्
मम् मम् मम् माय रूपम्, प्रणमत सततम् भैरवम् क्षेत्रपालम् ||४ ||


ॐ शम् शम् शम् शंख हस्तम् शशिकरधवलम् यक्ष संपूर्ण तेजम्
मं मं मं माय मायं कुलमकुल कुलं मंत्रमूर्ति स्वतत्वं |
भं भं भं भूतनाथं किलकिलित वचच्शार्लू गृह्णालू लंतं |
अं अं अं अन्तरिक्षम्, प्रणमत सततम् भैरवम् क्षेत्रपालम् || ५ ||

ॐ खं खं खं खड्गभेदम् विषम मृतमयम् काल कालाधकारम |
क्षीं क्षीं क्षीं क्षिप्रवेगम् दह दह दहनम् गवितं भूमिकम्पं |
शं शं शं शांत रूपम सकल शुभकरं देवगधर्व रूपं |
वं वं वं वाल लीला , प्रणमत सततम् भैरवम् क्षेत्रपालम् || ६ ||

ॐ सं सं सं सिद्धि योगम् सकलगुणमयं देव देवम् प्रसन्नम्
पं पं पं पद्मनाभम् हरिहर वरदं चन्द्र सूर्याग्नि नेत्रम् |
जं जं जं जक्षनागं सतत भयहरं सर्वदेव स्वरुपम |
रौं रौं रौं रौद्ररूपं , प्रणमत सततम् भैरवम् क्षेत्रपालम् || ७ ||

ॐ हं हं हं हंस घोषम हसित कहकहा रावरूरुद्राटटहासं
यं यं यं यक्ष सुप्तं शिर कनक महा वदध खट्वांगनाशं |
रं रं रं रंगरंग प्रहसित वदनम पिंगकस्या श्मशानं |
सं सं सं सिद्धिनाथम प्रणमत सततम् भैरवम् क्षेत्रपालम् ||८ ||

एवं यो भावयुक्तं पठति च यतः,भैरवस्याष्टकम् हि,
निर्विघ्नं दुःखनाशं असुरभयहरं शाकिनीनां विनाशः।
दस्युर्न व्याघ्रसर्पः धृति विहसि सदा राजशस्त्रोस्तथाज्ञात ,
सर्वे नश्यन्ति दूराद्ग्रह गणविषमांश्चेति चांतेष्ट सिद्धिः॥॥

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