क्यों श्री राम ने दिया लक्ष्मण को मृत्यु दंड

एक और अनसुनी कहानी कि भगवान राम ने अपने ही भाई लक्ष्मण को क्यों मारा था ?

भगवान राम के तीन भाई थे उनमें से उनके एक सबसे प्रिय भ्राता लक्ष्मण जी थे ! लक्ष्मण जी श्री राम भगवान को बहुत मानते थे ! जब भगवान श्री राम 14 वर्ष के वनवास के लिए जा रहे थे तब लक्ष्मण ने भी उनके साथ चलने के लिए हठ  किया था और उनके साथ गए थे ! लक्ष्मण ने भगवान राम के हर सुख और दुख में उनका बहुत साथ निभाया ! फिर भी लक्ष्मण से ऐसी क्या गलती हुई होगी जिसके लिए भगवान श्री राम ने उनको मृत्युदंड देना पड़ा ! सबसे बड़ी बात तो यह थी कि भगवान राम एक न्याय प्रिय एवं भक्तवत्सल कहलाने वाले राजा थे ! फिर भी लक्ष्मण से क्या गलती हुई कि उन्होंने उनको मृत्यु दंड दिया ! आइए जानते हैं आखिर क्यों देना पड़ा भगवान राम को अपने ही सबसे प्रिय अनुज

लक्ष्मण को मृत्युदंड :- एक बार की बात है भगवान राम से मिलने के लिए यमराज उनके महल पहुंचे ! उनको भगवान राम से किसी विषय पर चर्चा करनी थी ! जब यमराज से भगवान राम ने पूछा कि यहां आने की कोई खास वजह तो यमराज ने कहा कि मुझे आपसे कुछ जरूरी बातें करनी है ! यमराज को लेकर भगवान राम कक्ष में चले गए और वहां यमराज ने श्रीराम प्रभु से कहा की आप वचनबद्ध राजा है तो जब तक हमारी बात पूर्ण नहीं होती तब तक इस कक्ष में कोई नहीं आएगा वचन दीजिए कि अगर कोई भी प्राणी अपनी वार्तालाप के बीच में इस कक्ष के अंदर आता है तो उसे मृत्युदंड दिया जाएगा ! भगवान राम ने यमराज को वचन दिया कि ऐसा ही होगा ! श्री राम प्रभु लक्ष्मण को सबसे भरोसेमंद मानते थे तो उन्होंने लक्ष्मण को पहरे पर खड़ा कर दिया और किसी को भी अंदर ना आने का कहा ! उन्होंने कहा कि किसी को भी अंदर आने की अनुमति ना दी जाए ! ( ऋषि मुनियों का मानना है कि यमराज श्री राम प्रभु से मिलने के लिए एक साजिश के तहत आए थे यमराज का कहना था कि लक्ष्मण विष्णु भगवान के शेषनाग अवतार हैं उनकी मृत्यु होना मुश्किल है तो उन्होंने इस साजिश का रुख अपनाया और वह अपनी इस चाल में कामयाबी हुये है ) सब ठीक चल रहा था श्री राम प्रभु और यमराज के बीच में वार्तालाप जारी थी और लक्ष्मण जी अपने कार्य को भली भांति निभा रहे थे तभी अचानक वहां पर ऋषि दुर्वासा आते हैं और तुरंत प्रभु श्रीराम से मिलने की बात कहते हैं इस बात पर लक्ष्मण ने कहा कि श्री राम अभी यमराज से वार्तालाप कर रहे हैं अभी उनसे मिलने की किसी को भी अनुमति नहीं है ! इस बात को सुनकर ऋषि दुर्वासा क्रोधित हो गए और लक्ष्मण से बोले कि या तो मुझे श्री राम से मिलने की अनुमति दी जाए वरना मैं सारी अयोध्या नगरी को नष्ट होने का श्राप दे दूंगा ! यह सब सुनकर लक्ष्मण सोच में पड़ गए कि आखिर करें तो क्या करे !

यह सोच विचार के बाद लक्ष्मण ने निर्णय लिया कि संपूर्ण अयोध्या नगरी के लोगों के प्राण संकट में डाल देने से अच्छा है मैं खुद के प्राण संकट में डाल दूं ! यह सोचकर वह अंदर कक्ष में प्रवेश कर गए और फिर प्रभु ने लक्ष्मण को आता देखकर बोले तुमको पता था कि अगर हमारी वार्तालाप के बीच में कोई भी प्राणी आएगा तो उसे मृत्युदंड दिया जाएगा तो तुमने अपने प्राण संकट में क्यों डाले ! यह सब सुनकर लक्ष्मण बोले कि ऋषि दुर्वासा आपसे मिलना चाह रहे थे और उनके हट की वजह से मुझे कक्ष में आना पड़ा ! उसके बाद भगवान श्री राम यमराज से अपनी वार्तालाप पूर्ण करने के बाद ऋषि दुर्वासा से मिलने चले गए जब वो ऋषि दुर्वासा से मिल कर वापस आए तो यमराज ने राम से बोला कि आपको अपने वचन के अनुसार अब लक्ष्मण को मृत्युदंड देना होगा ! श्री राम सोच में पड़ गए कि वह अपने सबसे प्रिय भ्राता को मृत्यु दंड कैसे दे सकते हैं ! इसी परेसानी को लेकर वह अपने गुरु वशिष्ट के पास गए और वहां अपनी सारी समस्या उनके सामने प्रकट की ! अब गुरू ने श्रीराम को एक सुझाव दिया कि अपनों का त्याग करना भी मृत्युदंड के समान होता है ! अतः आप लक्ष्मण का त्याग कर दीजिए ! लक्ष्मण ने जब यह सब सुना तो बोले वैसे भी आप से दूर रहकर जीवित नहीं रह पाऊंगा ! इस से अच्छा है कि मैं आपके वचन का सम्मान करू ! यह सब बोलकर वो महल से चले गए और वहां से जाने के बाद वे सरयू नदी में जाकर जल समाधि ले लेते हैं ! इसीलिए तो कहा जाता है कि “रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाई” !
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